| بسته به تو سلسلهي ممکنات! | | اي صفت خاص تو واجب به ذات! |
| حجت اثبات وجود تواند | | کون و مکان شاهد جود تواند |
| مرحلهي خاک قرار از تو بافت | | دايرهي چرخ مدار از تو يافت |
| تربيت لطف تواش باغبان | | عرصهي گيتي که بود باغسان |
| در چمن نطق، زبان آوران | | بلبل آن، طبع سخن پروران |
| بر صفت هستي قادر گواست | | اينهمه آثار، که نادر نماست |
| نظم کن سلک نوادر تويي | | رو به تو آريم که قادر تويي |
| باغ شود بر دل نظاره داغ | | باغ نشان گر ندهد زيب باغ |
| هر ورقي باشد از آن دفتري | | ور دهدش جلوه به هر زيوري |
| باشي و ميدان شب و روز، ني | | بودي و اين باغ دلافروز، ني |
| نيست به خود، هست به تو هر چه هست | | اي علم هستي ما با تو پست! |
| هست که هستي بود، الحق تويي! | | هست توئي، هستي مطلق تويي! |
| ميگذري بر همه نام و نشان | | نام و نشانت نه و دامن کشان |
| پاک ز آلايش ناپاک و پاک | | با همه چون جان به تن آميزناک |
| بحر محيطي و کناريت نه! | | نور بسيطي و غباريت نه! |
| گوهرت از موج فتد بر کنار | | نيست کناريت ولي صد هزار |
| نيست ز غير تو نشان غير نام | | با تو خود آدم که و عالم کدام؟ |
| نيست درين عرصه کسي غير تو | | گرچه نمايند بسي غير تو |
| ميزنم اندر طلبت دست و پا | | تو همه جا حاضر و من جابهجا |
| جود تو سرمايهي سود همه! | | اي ز وجود تو نمود همه! |
| مردگي و زندگي از توست و بس! | | هستي و پايندگي از توست و بس! |
| چون علم خسروياش سربلند، | | جامي اگر نيست ز بخت نژند |
| زير علم سايه پسنديش ده! | | از علم فقر بلنديش ده! |
| مرهم راحتنه آزارها! | | اي ز کرم چارهگر کارها! |
| قبله نمايندهي هر مقبلي! | | عقده گشايندهي هر مشکلي! |
| خوشهده دانهفشانان خاک! | | توشهنه گوشهنشينان پاک! |
| قبلهي توحيد يکانديشگان! | | بازوي تاييد هنرپيشگان! |
| مرسله بند گلوي شاخسار! | | شانه زن زلف عروس بهار! |
| دست توان، قوت کار از تو يافت | | پاي طلب، راه گذار از تو يافت |
| دست همه، دست تو را آستين | | بلکه تويي کارگر راستين |
| جز تو کسي کيد از او هيچ کار | | نيست درين کارگه گير و دار |
| چشم عنايت ز تو داريم و بس! | | روي عبادت به تو آريم و بس! |
| ره به نهانخانهي تحقيق ده! | | در کف ما مشعل توفيق نه! |
| بادهي راز از قدح دل دهند | | اهل دل از نظم چون محفل نهند |
| رونق نظمش به نظامي رسان! | | رشحي از آن باده به جامي رسان! |
| بر گذر قافيه جامي سزاست | | قافيه آنجا که نظامي نواست، |
| وين هوس از طبع زبون من است، | | اين نفس از همت دون من است |
| کي بودم رشتهي اميد سست؟ | | ورنه از آنجا که کرمهاي توست |
| شايدم از جام سخن جرعهخوار | | صد چو نظامي و چو خسرو هزار |
| مرتبهي شعر پسنديم بخش | | بر همه در شعر بلنديم بخش |
| خاصه به نعت سر پيغمبران | | پايهي نظمم ز فلک بگذران |
| گوهر درج صدف کاينات | | اختر برج شرف کاينات |
| چرخ نزد خيمهي زرينطناب | | جز پي آن شاه رسالتمب |
| ماه نشد قبهي اين بارگاه | | جز پي آن شمع هدايتپناه |
| مشعلهي مهر نيفروختند | | تا نه فروغ از رخش اندوختند |
| مرغ هواي حرمش جبرئيل | | رشحهي جام کرمش سلسبيل |
| خيز که شد مشرق و مغرب خراب | | اي به سراپردهي يثرب به خواب! |
| دستي و، بنماي يکي دستبرد! | | رفته زدستيم، برون کن ز برد |
| بازخر از ناخوشي اسلام را! | | توبه ده از سرکشي ايام را! |
| رايت مهدي به فلک زن دلير! | | مهد مسيح از فلک آور به زير! |
| مهره شکن سبحهي تلبيس را! | | شعله فکن خرمن ابليس را! |
| بلکه جهان جامهي ماتم گرفت | | ظلمت بدعت هه عالم گرفت |
| باز کند نور جمالت طلوع | | کاش فتد ز اوج عروجت رجوع |
| گلخن گيتي ز تو گلشن شود | | ديدهي عالم به تو روشن شود |
| ظلمتيان رو به عدم درکشند | | دولتيان از تو علم بر کشند |
| روي تو ناديده گرفتار توست | | جامي از آنجا که هوادار توست |
| بر قدمت سر نهد و جان دهد | | گر لب جانبخش تو فرمان دهد |
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